Bharatmata Cinema


मेरा नाम कपिल भोपटकर है| मै इस थियटर का मैनेजिग पार्टनर हूँ| मुंबई में केवल यह थिएटर है जहां अभी भी मराठी फिल्में दिखाई जाती है| यह थिएटर इस जगह के आसपास की मिल संस्कृति के साथ भी जुड़ा हुआ है| यह सब 1930 में शुरू हुआ जब सिनेमा शुरू हुआ था|यह भूखंड, मिल मजदूरों के मनोरंजन के लिए आवंटित किया गया था|तब मुंबई की संस्कृति अलग थी| यहाँ कोई नहीं रहना चाहता था|ब्रिटिश यहां उनके कार्यकर्ताओं को लाते थे लेकिन, वे जल्द ही छोड़ कर वापस कोंकन चले जाते थे|तो उत्पादन बाधित हो जाता था| लोगों की समस्या यह थी कि वे मुंबई में रहेंगे कहां, इसलिए उन्होने कई चौल बनाई| फिर उन्हें लगा कि तब जरूरत थी कि उन्हें मनोरंजन दिया जाए|तब सिनेमा अगले बड़ी चीज थी| फिर उन्होने एक वास्तुकार को काम पर रखा। उसका नाम श्री इंजीनियर था। उन्होंने इस थियेटर का निर्माण किया। तब उन्हें एहसास हुआ उन्हें पता नहीं था कि, एक थियेटर को कैसे चलाते है। क्योंकि फिल्म निर्माण और वितरण का केंद्र तब, के लिए कहा जो थिएटर चला सकता था ।
मेरे दादा श्री सदाशिव भोपटकर एक मूक फिल्म अभिनेता थे । और थिएटर प्रबंधन में भी काम कर रहे थे। वो जबलपुर, मध्य प्रदेश में। स्थापित करने के लिए उन से पूछा। इस तरह मेरे परिवार का 1937 में थियेटर जगत में प्रबेश हुआ। तो 1937 में मेरे दादा ने यह थिएटर चलना शुरू कर दिया, तो उन्होने नाम इसका नाम, बदल दिया था। थिएटर का नाम लक्ष्मी थिएटर था और उन्होने इसे भारत माता में बदल दिया। यह स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एक श्रद्धांजलि की तरह है। उन्हें एहसास हुआ कि थिएटर के ज्यादातर, दर्शक मिल मजदूरों थे। इसलिए उन्होंने मिल मजदूरों के लिए थिएटर खोला। हमारे शो का वक्त, भी मिल की पारियों के अनुसार समायोजित किया गया।
यही कारण है कि हम अपने ही संरक्षक मिलने लगे । 1941-42 तक हम स्थापित हो गए थे। इस तरह हमने ब्रिटिश अधिकारियों के लिए, खुले एक थिएटर को मिल मजदूरों के थिएटर में परिवर्तित किया। तब से ग्राहक हम पर मेहरबान है। १९८४ में हमें अचानक झटका लगा । क्योंकि मिलों पर हडताल हो गयी थी ।
८२ में शुरुवात हो गई थी लेकिन ८४ में मिलों को बंद कर दिया गया था। वे बेरोजगार थे और उनके पास पैसा नहीं था तब हममे अपने कई संरक्षक खो दिए। इसलिए हमें भी एक बड़ा झटके का सामना करना पड़ा। उस दौरान वीडियो पार्लर भी शुरू हुए थे और मध्य 80 के दशक में बहुत लोकप्रिय भी थे। पूरा उद्योग मारा गया था। लेकिन हम उस तूफान से उभर गए और हमने वह किया जो हम कर सकते थे । मेरे पिता से एक बार एक पत्रकार द्वारा पूछा गया था,
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क्या उन्हें लगता था कि यह थिएटर की मौत थी। सब को लगता था कि हर थिएटर का अंत हो गया है। और कोई एक थिएटर में फिल्में देखने नहीं आएगा। मेरे पिता ने कहा,एक इंसान के रूप में हम अकेले नहीं दूसरों की साथ में समय बिताना पसंद करतें हैं । एक थिएटर में फिल्म देखने का विचार भी एक सामूहिक अनुभव है और वह कभी खत्म नहीं होता। 1990 के दशक में केबल युग था और आज भी 200-250 चैनल है, लेकिन हम उनके साथ जी रहे हैं। सभी जगह पर, मल्टीप्लेक्स खुल गए हैं, लेकिन टिकट की कीमतें कुछ लोगों के लिए बहुत महंगी हैं, वे अभी भी भारतमाता सिनेमा में आते है। संख्या से थोड़ा कम है। लेकिन वे सभी सिनेमाघरों के लिए है। हम एक अपवाद नहीं हैं। मिल मजदूर भी हड़ताल से बच गए है। वे सभी वापस अपने गांव नहीं गए। वे भी यहां रुके थे। मॉल या कॉरपोरेट जगत में काम करने वाले मिल मजदूरों की अगली पीढ़ी फिरसे भारतमाता में आते है।

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